Subhash Jayanti Celebrate as Parakram Divas

 SUBHASH JAYANTI CELEBRATE AS PRAKRAM DIVAS

मोदी सरकार की घोषणा - सुभाष जयंती  मनाया जाएगा,"पराक्रम दिवस " के रूप में

Subhas jayanti celebrate as parakarm divas


मोदी सरकार ने प्रतिवर्ष 23 जनवरी को नेताजी की जयंती को पराक्रम दिवस के तौर पर मनाने का फैसला किया है ताकि देश के लोगों, विशेषकर युवाओं अपने भाग्य और आपदाओं का सामना करने के लिए प्रेरित किया जा सके.

भारत सरकार ने हर साल नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती 23 जनवरी को 'पराक्रम दिवस' के तौर पर मनाने का फैसला किया है ताकि उनकी भावना से देश के युवाओं को प्रेरित किया जा सके.  

यह वर्ष नेताजी सुभाष चंद्र बोस का 125वां जयंती वर्ष है और भारत सरकार ने इसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर धूमधाम से मनाने का फैसला किया है.

उद्देश्य

केंद्र ने देश के लोगों, विशेषकर युवाओं को प्रेरित करने के लिए  साल 23 जनवरी को आने वाली  नेताजी की जयंती को पराक्रम दिवस के तौर पर मनाने का फैसला किया है, ताकि युवा अपने जीवन में आने वाली किसी भी आपदा के दौरान बहादुरी से काम करें जैसेकि नेताजी ने अपने जीवन में सभी प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना किया और वे आजीवन देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत रहे.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में

सुभाष चंद्र बोस को जुलाई 1940 में "भारत सुरक्षा कानून" के तहत गिरफ्तार करके कोलकाता में बंद कर दिया गया था। लेकिन बोस के भूख हड़ताल करने पर 5 दिसंबर 1940 को उनको घर पर नजरबंद कर दिया गया। 18 जनवरी 1941 को सुभाष चंद्र बोस अपने घर से एक पठान जियाउद्दीन के वेश में फरार हो गए। कई परेशानियों का सामना करके सुभाष चंद्र बोस काबुल से होते हुए ऑरलैंडो मैजोन्टा नामक एक जाली पासपोर्ट की सहायता से मास्को पहुंचे। 


मास्को से वे 28 मार्च 1941 को बर्लिन पहुंचे। बर्लिन  में सुभाष चंद्र बोस की मुलाकात हिटलर से हुई और हिटलर ने उन्हें नेताजी की उपाधि प्रदान की। वही पर हिटलर ने सुभाष चंद्र बोस को बर्लिन रेडियो से ब्रिटिश विरोधी प्रचार करने तथा जर्मनी में भारतीय युद्ध बंदियों से एक आजाद हिंद फौज स्थापित करने की आज्ञा प्रदान की। नेता जी ने इसके बाद रोम और पेरिस में भी "स्वतंत्र भारत केंद्र "स्थापित किए थे
28 मार्च 1942 को टोक्यो में भारतीयों का एक सम्मेलन आयोजित हुआ जिसमें कैप्टन मोहन सिंह, रासबिहारी बोस एवं निरंजन सिंह गिल  के सहयोग से "भारतीय राष्ट्रीय सेना" का गठन किया गया। बैंकॉक सम्मेलन में ही भारतीय सेना के कैप्टन मोहन सिंह ने ढाई हजार युद्ध बंदियों को लेकर आजाद हिंद फौज की औपचारिक स्थापना की थी। 


किन्हीं कारणवश रासबिहारी बोस ने सेना के पुनर्गठन की बागडोर नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सौंपी। 4 जुलाई को "बोस इंडियन इंडिपेंडेंस लीग "के अध्यक्ष बने।

यहीं पर नेता जी ने आजाद हिन्द फौज द्वारा ब्रिटेन के विरुद्ध आक्रमण करने की घोषणा कर दी। नेता जी ने 5 जुलाई 1948 को सिंगापुर के टाउन हॉल के सामने सुप्रीम कमांडर के रूप में सेना को संबोधित करते हुए "दिल्ली चलो "का नारा दिया और कहां कि "हमारी मातृभूमि स्वतंत्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो ,मैं तुम्हें आजादी दूंगा। यह स्वतंत्रता देवी की मांग है।"


सिंगापुर के टाउन हाल में एक विशाल जनसभा में बोस ने आजाद हिंद की अस्थाई सरकार बनाने की घोषणा की। बोस ही इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सेना अध्यक्ष थे|
वित्त विभाग एसी चटर्जी ,प्रचार विभाग एस ए अय्यर तथा महिला संगठन लक्ष्मी स्वामीनाथन को सौंपा गया। बॉस और उनके सहयोगियों ने शपथ लिया। इसके बाद गुरु रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा  रचित राष्ट्रीय गान हुआ।

 इस सरकार को जापान ,जर्मनी ,कोरिया, चीन ,इटली एवं आयरलैंड ने मान्यता दी थी।
25 अक्टूबर 1943 को सुभाष चंद्र बोस ने ब्रिटेन और अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। 6 नवंबर 1947 को जापान ने अपने कब्जे वाले दो भारतीय द्वीप अंडमान एवं निकोबार अस्थाई सरकार को सौंप दिए। 31 दिसंबर 1943 को आजाद हिंद फौज का इन पर कब्जा हो गया तथा इनका नामकरण क्रमशः शहीद और स्वराजदीप कर दिया गया।


जनवरी 1944 में आजाद हिंद की सेना रंगून पहुंच चुकी थी जहां पर आजाद हिंद की सेना ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए ब्रिटिश सेना को पराजित किया। 14 अप्रैल 1944 को मणिपुर के मोरंग स्थान पर भारत का तिरंगा फहराया गया।
6 जुलाई 1944 ई० में सुभाष चंद्र बोस द्वारा एक रेडियो स्टेशन से गांधी जी को राष्ट्रपिता कहते हुए उनका समर्थन और आशीर्वाद मांगा। द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की सेनाओं को अमेरिका और इंग्लैंड से कड़ी टक्कर मिली और इसी बीच अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम से हमला कर दिया जिसके कारण जापान की सेना पीछे हटे लगी। जापान के पीछे हटने से आजाद हिंद फौज को भारी नुकसान हुआ जिसके कारण आजाद हिंद फौज की सेना का मनोबल टूटने लगा और पराजय का सामना करना पड़ा।


13 अगस्त 1945 को सुभाष चंद्र बोस सिंगापुर पहुंचे। 18 अगस्त 1945 को बोस और हबीबुर्रहमान टोक्यो जाने के लिए फार्म सा हवाई अड्डे से विमान पर रवाना हुए। लेकिन ऐसा कहा जाता है कि विमान उडते ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया। उसके बाद सुभाष चंद बोस के बारे में आज भी रहस्य बना हुआ है। 


भारत के आजादी के बाद कई केंद्र सरकार ने सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु पर अनेक कमेटियों का गठन किया परंतु अब तक किसी स्पष्ट निर्णय पर नहीं पहुंचा गया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा भारत को स्वतंत्र करवाने का यह प्रयास हमारे  स्वाधीनता संग्राम का एक स्वर्णिम अध्याय है जिसे हम और हमारी आने वाली पीढ़ियां कभी नहीं भूल पाएगी। 

जय हिंद

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